चंडीगढ़ स्थित इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के मुख्यालय में आयोजित एक उच्च-स्तरीय प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राज्य के पूर्व वित्त मंत्री प्रो. संपत सिंह ने मौजूदा प्रशासन और विद्युत नियामक निकायों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने हाल ही में इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड नामक निजी संस्था को पच्चीस लंबी अवधि के लिए समानांतर विद्युत आपूर्ति का लाइसेंस जारी किए जाने के कदम को राज्य और केंद्र स्तर की सत्तासीन व्यवस्थाओं द्वारा सुनियोजित ढंग से लागू किया गया जनविरोधी षड्यंत्र करार दिया है। उनके अनुसार, इस तरह के निर्णय अंततः सार्वजनिक क्षेत्र की उपयोगिता को कमजोर करने और आम जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डालने का माध्यम बन रहे हैं।
वरिष्ठ नेता ने कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि राज्य का विद्युत नियामक आयोग अपने मूल वैधानिक कर्तव्यों और जनहित की प्राथमिकताओं से पूरी तरह विमुख हो चुका है। वर्तमान में यह संस्था कथित तौर पर शासन के हाथों की कठपुतली बनकर काम कर रही है, जिसका एकमात्र उद्देश्य ऊर्जा क्षेत्र के मुनाफे का निजीकरण करना और तमाम वित्तीय घाटे का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बोझ आम नागरिकों के कंधों पर मढ़ना है। इस पूरे घटनाक्रम के विरोध में सड़क से लेकर अदालत तक संघर्ष का ऐलान करते हुए उन्होंने बिजली कर्मचारियों की चल रही हड़ताल को अपनी पार्टी की तरफ से पूर्ण और नैतिक समर्थन देने की घोषणा की है।
शीर्ष नेतृत्व की संलिप्तता और वित्तीय विसंगतियों के आरोप
प्रो. संपत सिंह ने अपने संबोधन में यह दावा भी किया कि यह पूरा अनुबंध एक केंद्रीय मंत्री के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन और इशारे पर तय हुआ है। जिस इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को यह व्यावसायिक अधिकार दिया गया है, उसकी स्थापना हाल ही में हुई थी और उसकी मूल अधिकृत पूंजी मात्र एक करोड़ रुपये थी। इसके बावजूद इतनी छोटी और नई इकाई को हजारों करोड़ की भारी-भरकम परियोजना सौंप दी गई। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि संबंधित कंपनी का काल्पनिक बाजार मूल्यांकन चार हजार करोड़ रुपये से अधिक मान लिया गया, जबकि उसका वास्तविक ऑडिटेड बही खाता मूल्य नब्बे करोड़ रुपये के आसपास ही था।
ऊर्जा मंत्री और मुख्यमंत्री के उन बयानों को भी आड़े हाथों लिया गया जिनमें उन्होंने इस आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय या अपीलीय मंचों पर जाने की बात कही थी। विपक्षी नेता ने इसे जनता की आंखों में धूल झोंकने वाला ढोंग बताया। उन्होंने मांग की कि मुख्यमंत्री को फौरन विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 108 के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए लिखित नीतिगत निर्देश जारी करने चाहिए, ताकि इस समानांतर वितरण प्रणाली की प्रक्रिया पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाई जा सके।
| तत्व / विषय | विवरण एवं आंकड़े |
|---|---|
| लाइसेंस प्राप्तकर्ता कंपनी | इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड |
| लाیسेंस की अवधि | 25 वर्ष (समानांतर बिजली वितरण) |
| कंपनी की शुरुआती पूंजी | मात्र 1 करोड़ रुपये |
| परियोजना का कुल आकार | लगभग 4700 करोड़ रुपये |
| गुरुग्राम का राजस्व योगदान | दक्षिण हरियाणा बिजली निगम का 42.98% (9,493 करोड़ रुपये) |
| अनुमानित क्रॉस-सब्सिडी हानि | प्रतिवर्ष लगभग 3,000 से 4,272 करोड़ रुपये |
अधिकारियों की भूमिका और पूर्व ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला
विपक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि जब इस निजी इकाई ने लाइसेंस के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था, तब भी सजग मंचों और राजनीतिक दलों द्वारा कड़ी आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। विनियामक आयोग के स्तर पर चली सुनवाई के दौरान भी इसका विरोध हुआ, लेकिन अंततः एक विशेष समिति की आड़ लेकर वह निर्णय थोप दिया गया जिसे शासन पहले से ही अमलीजामा पहनाने का मन बना चुका था। इस पूरी प्रक्रिया में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए और कहा गया कि इस मामले में अन्य दल भी परोक्ष रूप से सत्तापक्ष की कार्यप्रणाली के साझीदार नजर आते हैं।
ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए स्मरण कराया गया कि वर्ष 1998 में भी विदेशी वित्तीय संस्थाओं के दबाव में बिजली निगमों के निजीकरण के प्रयास हुए थे, जिन्हें तब की क्षेत्रीय सरकार ने जनहित को सर्वोपरि रखते हुए सिरे से खारिज कर दिया था। वर्तमान प्रशासनिक कदम से न केवल सरकारी उपक्रमों की वित्तीय सेहत बिगड़ेगी, बल्कि कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा और स्थिरता पर भी तलवार लटक जाएगी।
"यह फैसला उन तमाम बलिदानों के साथ खुला विश्वासघात है जो सार्वजनिक बिजली वितरण तंत्र को उबारने के लिए दिए गए थे। उदय योजना और अन्य आधारभूत संरचनाओं पर जनता के धन से हजारों करोड़ का निवेश किया गया, लेकिन अब उन्हीं निगमों को कमजोर किया जा रहा है।" - प्रो. संपत सिंह, पूर्व वित्त मंत्री
सार्वजनिक उपक्रमों और आम उपभोक्ताओं पर पड़ने वाला दूरगामी असर
इस नई व्यवस्था के लागू होने से राज्य के विद्युत ढांचे पर गंभीर और दीर्घकालिक वित्तीय संकट मंडराने लगा है। औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ता जो अधिक राजस्व उत्पन्न करते हैं, वे निजी हाथों की तरफ आकर्षित हो सकते हैं। इसका सबसे बड़ा आघात दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम जैसे सार्वजनिक उपक्रमों पर पड़ेगा, जो गुरुग्राम जैसे बड़े आर्थिक केंद्रों से होने वाली आय के सहारे ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि सेक्टर को सब्सिडी प्रदान करते हैं।
विश्लेषण के अनुसार, यदि मलाईदार उपभोक्ता निजी कंपनी के पास चले गए तो सार्वजनिक निगमों को सालाना हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा। इस भारी भरकम राजस्व घाटे और क्रॉस-सब्सिडी के संकट की भरपाई अंततः आम उपभोक्ताओं, छोटे दुकानदारों, किसानों और ग्रामीण परिवारों की जेब से ही की जाएगी। करदाताओं और जरूरतमंद वर्गीय परिवारों को अंततः कॉरपोरेट मुनाफे की कीमत चुकानी पड़ेगी।
अगली प्रशासनिक और कानूनी रणनीतिक दिशा
कर्मचारी संगठनों, इंजीनियरों के संयुक्त मोर्चे और किसान यूनियनों के साथ पूरी एकजुटता दिखाते हुए विपक्षी नेताओं ने साफ कर दिया है कि इस जनविरोधी निर्णय को किसी भी सूरत में चुपचाप स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार को चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते संवाद स्थापित कर इस लाइसेंस को रद्द नहीं किया गया, तो तकनीकी, कानूनी और राजनीतिक स्तर पर एक व्यापक निर्णायक संघर्ष छेड़ा जाएगा जो सड़कों से लेकर अदालतों तक लड़ा जाएगा।





