पारदर्शिता और जवाबदेही के दावों के बीच हरियाणा राज्य सूचना आयोग ने प्रशासनिक सुस्ती के खिलाफ एक कड़ा संदेश देना शुरू कर दिया है। राज्य में सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत दायर होने वाली प्रथम अपीलों का समयबद्ध निस्तारण न किए जाने और प्रार्थी को समय पर दस्तावेज उपलब्ध न कराने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया को तेज कर दिया गया है। इसी कड़ी में, आयोग ने प्रशासनिक स्तर पर गंभीर रुख अपनाते हुए मामलों को संबंधित प्रथम अपीलीय प्राधिकारियों के पास दोबारा भेजना शुरू कर दिया है ताकि प्रशासनिक लापरवाही पर लगाम लगाई जा सके।
इसी प्रशासनिक सख्ती के तहत, मुख्य सूचना आयुक्त टीवीएसएन प्रसाद ने तकनीकी शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव कार्यालय के प्रथम अपीलीय प्राधिकारी को कारण बताओ नोटिस थमाया है। यह कार्रवाई एक बेहद संवेदनशील मामले में बरती गई सुस्ती के बाद की गई है, जिसमें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से जुड़ी जानकारी छिपाई जा रही थी। आयोग के इस कड़े रुख से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है और आरटीआई आवेदनों को दबाने वाले अधिकारियों में अब यह डर बैठ गया है कि कोताही बरतने पर उन पर सीधी कार्रवाई हो सकती है।
यमुनानगर के पॉलिटेक्निक में भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा है पूरा मामला
यह पूरा कानूनी और प्रशासनिक पेंच यमुनानगर स्थित जय प्रकाश पॉलिटेक्निक, डामला में पनपे कथित भ्रष्टाचार के मामलों की शिकायतों से निकला है। इस संस्थान में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर एक नागरिक ने आरटीआई के तहत विस्तृत ब्योरा मांगा था। हालांकि, निर्धारित समयावधि बीत जाने के बाद भी जब आवेदक को कोई संतोषजनक जवाब या दस्तावेज नहीं मिले, तो उसने राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग ने मामले की गंभीरता को भांपते हुए इस पर तुरंत संज्ञान लिया और संबंधित महकमे से जवाब तलब किया।
सुनवाई के दौरान जब फाइल खुली, तो प्रशासनिक स्तर पर भारी कोताही सामने आई। विशेष सचिव एवं प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि उन्होंने 12 अक्टूबर को ही इस पद का कार्यभार संभाला है। इसके बाद, आयोग के गत 8 अगस्त के स्पष्ट निर्देशों का पालन करते हुए उन्होंने स्थिति को सुधारा और 16 अक्टूबर को इस संबंध में विधिवत कारण सहित आदेश पारित कर दिया। हालांकि, विलंब से उठाए गए इस कदम ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
| मुद्दा / विवरण | संबंधित तथ्य व प्रशासनिक स्थिति |
|---|---|
| संबंधित विभाग | तकनीकी शिक्षा विभाग, हरियाणा |
| संस्थान का नाम | जय प्रकाश पॉलिटेक्निक, डामला (यमुनानगर) |
| मुख्य मुद्दा | कथित भ्रष्टाचार की शिकायत से जुड़ी आरटीआई |
| कार्रवाई करने वाला निकाय | हरियाणा राज्य सूचना आयोग |
| प्रमुख अधिकारी | मुख्य सूचना आयुक्त टीवीएसएन प्रसाद |
| निर्णय की तिथि | 16 अक्टूबर (आदेश पारित) |
सतर्कता जांच रिपोर्ट आवेदक को सौंपने के कड़े निर्देश
मामلي की सुनवाई पूरी होने के बाद राज्य सूचना आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार जैसी गंभीर शिकायतों पर पर्दा डालने या फाइलों को दबाने की प्रवृत्ति को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आयोग ने अपने निर्देश में साफ किया है कि संस्थान से जुड़ी चल रही सतर्कता जांच जैसे ही पूरी होती है, उसकी पूरी रिपोर्ट तत्काल प्रभाव से मूल आवेदक को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। पारदर्शिता के इस सिद्धांत से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि सार्वजनिक संस्थानों में हो रही गड़बड़ियों की सच्चाई जनता के सामने आ सके।
इसके साथ ही, आयोग ने यह भी प्रावधान किया है कि यदि आरटीआई के तहत मांगी गई किसी विशेष जानकारी को कानून के दायरे में छूट प्राप्त है, तो भी हवा में जवाब देने के बजाय संबंधित कानूनी प्रावधानों और ठोस कारणों का स्पष्ट उल्लेख करते हुए लिखित आदेश पारित करना होगा। मनमाने ढंग से सूचना छिपाने के दिन अब लद चुके हैं, क्योंकि हर अधिकारी को अपने फैसले के पीछे का ठोस वैधानिक आधार देना अनिवार्य कर दिया गया है। आयोग का मानना है कि इस सख्त कार्यप्रणाली से प्रथम अपीलीय प्राधिकारियों की कार्यशैली में जवाबदेही की संस्कृति विकसित होगी।
"सतर्कता जांच पूरी होने के बाद उसकी रिपोर्ट आवेदक को अविलंब उपलब्ध कराई जाए। यदि किसी सूचना को देने से कानूनी छूट है, तो उसके सुसंगत प्रावधान और स्पष्ट कारण लिखित आदेश में दर्ज होने चाहिए।" - हरियाणा राज्य सूचना आयोग
प्रशासनिक व्यवस्था और जनहित पर पड़ने वाला दूरगामी प्रभाव
हरियाणा में सूचना के अधिकार कानून को कमजोर करने या फाइलों को बेवजह लटकाने की पुरानी संस्कृति पर इस नए कदम से गहरी चोट पड़ी है। आम नागरिक जब सरकारी या अर्द्धसरकारी संस्थानों में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो कई बार अधिकारी लालफीताशाही का सहारा लेकर सूचनाओं को दबाने की कोशिश करते हैं। इस बार आयोग की तरफ से प्रथम अपीलीय प्राधिकारियों को सीधे कठघरे में खड़ा किए जाने से यह संदेश साफ है कि अब जनहित से जुड़े मामलों में टालमटोल नहीं चलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की सख्ती से न केवल सरकारी विभागों में पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि उन लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा जो व्यवस्था में सुधार चाहते हैं। जब अधिकारियों को यह अहसास होगा कि समय पर सूचना न देने या पल्ला झाड़ने पर उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी, तो वे आरटीआई आवेदनों को गंभीरता से लेंगे। तकनीकी शिक्षा विभाग के इस प्रकरण ने राज्य के बाकी विभागों के लिए भी एक कड़ा उदाहरण पेश कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
आगामी प्रशासनिक कदम और निगरानी की दिशा
आयोग के इस ताजा रुख के बाद आने वाले दिनों में उन तमाम विभागों की फाइलों की समीक्षा हो सकती है जहां आरटीआई की प्रथम अपीलें महीनों से धूल फांक रही हैं। राज्य सूचना आयोग ने यह संकेत दे दिए हैं कि भविष्य में भी ऐसे मामलों में नरमी नहीं बरती जाएगी और सीधे तौर पर जिम्मेदार अधिकारियों को तलब किया जाएगा। भ्रष्टाचार के मामलों में निष्पक्ष जांच और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक होने से शिक्षण संस्थानों में भी अनुशासन और वित्तीय पारदर्शिता लौटने की उम्मीद बंध रही है।





