भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में शुमार राखीगढ़ी की प्राचीन धरोहर अब केवल संग्रहालयों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे आम जनजीवन और कला प्रेमियों के घरों तक पहुंचाने की एक अनूठी पहल शुरू की गई है। सिंधु घाटी सभ्यता के इस प्रमुख केंद्र के गर्भ में दबे पुरावशेषों और कलाकृतियों के डिजाइनों को अब ग्रामीण महिलाओं द्वारा हाथ से बुनी जाने वाली दरियों पर जीवंत किया जा रहा है। सदियों पुरानी हड़प्पाकालीन संस्कृति के इन प्रतीकों को दरियों के ताने-बाने में पिरोकर ये महिलाएं न केवल अपनी कला का प्रदर्शन कर रही हैं, बल्कि देश-विदेश तक इस महान सभ्यता के इतिहास का प्रसार भी कर रही हैं।
इस विशेष हस्तशिल्प परियोजना का सीधा प्रदर्शन हाल ही में आयोजित किए गए राखीगढ़ी महोत्सव के दौरान किया गया, जहां पर्यटकों ने इसे काफी सराहा। पीढ़ियों से इस पारंपरिक कला से जुड़ी महिलाएं अब इतिहासविदों द्वारा उपलब्ध कराए गए प्राचीन अवशेषों के रेखाचित्रों को रंग-बिरंगे सूती धागों के माध्यम से आकार दे रही हैं। इस पहल से एक ओर जहां ग्रामीण महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का नया जरिया मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर प्राचीन भारतीय इतिहास को एक बिल्कुल नए और रचनात्मक माध्यम से संरक्षित करने का अवसर भी प्राप्त हो रहा है।
पारंपरिक हथकरघा और ऐतिहासिक डिजाइनों का अनूठा संगम
राखीगढ़ी की स्थानीय महिलाओं ने इस कार्य के लिए पूरी तरह पारंपरिक और हस्तनिर्मित तरीकों को अपनाया है, जिसमें किसी भी प्रकार की आधुनिक मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। बीरमति, शीला, भतेरी देवी और मुन्नी देवी जैसी कुशल कारीगर महिलाएं अपनी पुरानी पीढ़ियों से मिली कला को आगे बढ़ा रही हैं। पारंपरिक रूप से ये परिवार केवल घरेलू उपयोग की दरियां, खेस और रजाई बनाते थे, जिन पर सामान्यतः ग्रामीण जीवन, पशु-पक्षियों या इंसानी आकृतियों के चित्र उकेरे जाते थे। हालांकि, अब जिला प्रशासन और परियोजना से जुड़े विशेषज्ञों द्वारा इन्हें हड़प्पाकालीन सभ्यता के विशेष मोटिफ और डिजाइन उपलब्ध कराए गए हैं।
इन डिजाइनों के तहत प्राचीन बैल की आकृतियों, विशेष बर्तनों के प्रारूप और सिंधु घाटी संस्कृति से जुड़े अन्य प्रतीकों को सूत के माध्यम से उकेरा जा रहा है। एक छोटे आकार की दरी को तैयार करने में लगभग दो दिन का समय लगता है, जबकि बड़े आकार की कलात्मक दरी को पूरा होने में एक सप्ताह तक की मेहनत लगती है। सूत की गुणवत्ता से लेकर रंगों के चयन तक हर चरण में विशेष सावधानी बरती जाती है, ताकि बुनाई के बाद रंग न छूटे और कलाकृति लंबे समय तक सुरक्षित बनी रहे।
| कारीगर का नाम | मुख्य कार्य / भूमिका | सामग्री और समय | मूल्य सीमा |
|---|---|---|---|
| बीरमति देवी | स्वयं सहायता समूह से जुड़ी प्रमुख दरी बुनकर | रंग-बिरंगा पक्का सूत, हाथ की बुनाई (2 से 7 दिन) | 100 से 1,000 रुपये |
| भतेरी देवी | राखीगढ़ी अवशेषों के आधार पर बैल व अन्य आकृतियां बनाना | पारंपरिक हथकरघा तकनीक | नियोजित आकार अनुसार |
| राहुल (शिल्पकार) | मिट्टी के बर्तन और खिलौने बनाना व प्रशिक्षण देना | प्राकृतिक चिकनी मिट्टी | कलाकृति अनुसार |
न्यायपालिका और शीर्ष स्तर पर मिल चुकी है सराहना
राखीगढ़ी की इस अनूठी हस्तशिल्प कला को राष्ट्रीय स्तर पर तब बड़ी पहचान मिली, जब इसी साल जनवरी के महीने में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत अपने हिसार दौरे के दौरान विशेष रूप से राखीगढ़ी संग्रहालय पहुंचे थे। वहां स्थानीय महिलाओं द्वारा हाथों से तैयार की गई इन रंग-बिरंगी दरियों को देखकर सीजेआई ने उनके हुनर की मुक्तकंठ से प्रशंसा की थी और उन्हें निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया था। इसके अलावा, जी-20 सम्मेलन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी राखीगढ़ी की मिट्टी से बनी कलाकृतियों और शिल्प को विदेशी मेहमानों को भेंट किया जा चुका है, जिसे हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कई बार वैश्विक मंचों पर प्रदर्शित किया है।
वर्तमान में इन दरियों को राखीगढ़ी आने वाले पर्यटकों के लिए ऑफलाइन माध्यम से उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि पर्यटक यहां की यात्रा की याद के तौर पर इन्हें अपने साथ ले जा सकें। जिला प्रशासन और परियोजना समन्वयकों की योजना भविष्य में इस हस्तशिल्प को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के जरिए ऑनलाइन उपलब्ध कराने की भी है, जिससे देश के किसी भी कोने से लोग इस ऐतिहासिक कला को खरीद सकें।
"राखीगढ़ी की इस प्राचीन सभ्यता को जन-जन तक पहुँचाने के लिए महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। आने वाले समय में इन उत्पादों को ऑनलाइन माध्यम से भी बेचा जाएगा ताकि देश-विदेश के हर कोने तक हमारा इतिहास पहुंच सके।" - वीरेंद्र श्योराण, जिला परियोजना समन्वयक, हिसार
स्थानीय संस्कृति, पर्यटन और रोजगार पर गहरा प्रभाव
इस ऐतिहासिक पहल का राखीगढ़ी और आसपास के संपूर्ण जीटी रोड बेल्ट के ग्रामीण अंचल पर व्यापक असर पड़ रहा है। पुरातत्व पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ स्थानीय महिलाओं के लिए स्वरोजगार के द्वार खुल गए हैं। हेरिटेज वॉक के माध्यम से आने वाले पर्यटकों को न केवल इतिहास की जानकारी मिल रही है, बल्कि वे यहां के स्थानीय हस्तशिल्प को खरीदकर सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की गतिविधियां सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधारने में मील का पत्थर साबित हो रही हैं। युवा पीढ़ी भी अपनी प्राचीन जड़ों से जुड़ रही है और पारंपरिक हुनर को आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप ढालने का प्रयास कर रही है।
भविष्य की रूपरेखा और ऑनलाइन विस्तार की योजनाएं
प्रशासन और स्थानीय समन्वयकों का अगला लक्ष्य इस हस्तकला को व्यापक डिजिटल बाजार से जोड़ना है। चूंकि वर्तमान में यह कार्य केवल सीमित ऑफलाइन माध्यमों से संचालित हो रहा है, इसलिए इसे बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने के लिए डिजिटल मार्केटिंग और ऑनलाइन डिलीवरी नेटवर्क तैयार करने पर काम चल रहा है। इससे न केवल राखीगढ़ी के शिल्पकारों की आय में कई गुना वृद्धि होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों तक भी हरियाणा की यह प्राचीन सांस्कृतिक पहचान आसानी से पहुंच सकेगी।





