हरियाणा की राजनीति में बिजली वितरण के निजीकरण का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री प्रो. संपत सिंह ने इस मसले पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार को आड़े हाथों लिया है। हिसार के सेक्टर-15 स्थित अपने निवास स्थान पर आयोजित एक महत्वपूर्ण पत्रकार वार्ता के दौरान संपत सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार बिजली निगमों को निजी हाथों में सौंपने की पूरी तैयारी कर चुकी थी, लेकिन बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों के एकजुट और उग्र आंदोलन ने सत्ता पक्ष को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया है।
संपत सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम को प्रदेश की जनता की जीत बताते हुए कहा कि सरकार अब केवल समीक्षा याचिका (Review Petition) के नाम पर समय काटने की कोशिश कर रही है। उन्होंने मांग की कि सरकार को 'बैकफुट' पर आने के बजाय इस निजीकरण के प्रस्ताव को आधिकारिक रूप से पूरी तरह रद्द कर देना चाहिए। इनेलो नेता ने बिजली क्षेत्र की वर्तमान स्थिति को चिंताजनक बताते हुए प्रशासनिक और राजनीतिक खामियों को उजागर किया।
प्रशासनिक ढांचा और खाली पदों का गणित
प्रो. संपत सिंह ने बिजली निगमों की कार्यक्षमता पर सवाल उठाते हुए आंकड़ों के साथ सरकार को घेरा। उन्होंने बताया कि प्रदेश में बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने वाले निगमों में भारी मात्रा में स्टाफ की कमी है, जो सीधे तौर पर सेवाओं को प्रभावित कर रही है। उनके अनुसार, विभाग की रीढ़ कहे जाने वाले तकनीकी और प्रशासनिक पदों पर लंबे समय से नियुक्तियां नहीं हुई हैं।
| विवरण | आंकड़े/जानकारी |
|---|---|
| कुल स्वीकृत पद (बिजली निगम) | लगभग 50,000 |
| वर्तमान में रिक्त पद | करीब 25,000 |
| प्रभावित क्षेत्र (निजीकरण प्रस्ताव) | गुरुग्राम और नूंह (मेवात) |
| प्रासंगिक कानूनी धारा | बिजली अधिनियम 2003 (धारा 108) |
| मुख्य मांग | पक्की भर्ती और निजीकरण का पूर्ण रद्दीकरण |
कांग्रेस की भूमिका पर तीखे सवाल
पत्रकार वार्ता के दौरान संपत सिंह का सबसे तीखा हमला मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर रहा। उन्होंने कांग्रेस की कार्यशैली पर संदेह जताते हुए कहा कि जब गुरुग्राम और नूंह में निजी कंपनियों को पैरलल बिजली वितरण (Parallel Licensing) का लाइसेंस देने की प्रक्रिया चल रही थी, तब कांग्रेस के नेता और विधायक चुप्पी साधे रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मुद्दे पर केवल इनेलो ने ही जनता की आवाज उठाई और सड़कों पर संघर्ष किया।
संपत सिंह ने कटाक्ष करते हुए कहा कि कांग्रेस के 9 विधायक इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा से भाग गए। उन्होंने सवाल किया कि आखिर क्या कारण था कि कांग्रेस ने नियामक आयोग (HERC) के समक्ष इस जनविरोधी फैसले का विरोध नहीं किया? इनेलो नेता के अनुसार, यह चुप्पी भाजपा और कांग्रेस के बीच किसी गुप्त समझौते की ओर इशारा करती है, जिससे प्रदेश के उपभोक्ताओं के हितों को नुकसान पहुंच सकता है।
कानूनी पेच और नियामक आयोग को निर्देश
बिजली अधिनियम 2003 की बारीकियों का जिक्र करते हुए संपत सिंह ने सरकार को संवैधानिक रास्ता दिखाया। उन्होंने कहा कि सरकार को केवल बयानबाजी करने के बजाय धारा 108 का उपयोग करना चाहिए। इस धारा के तहत राज्य सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह जनहित में राज्य विद्युत नियामक आयोग को नीतिगत दिशा-निर्देश जारी कर सके।
"सरकार को चाहिए कि वह समीक्षा याचिका के नाम पर मामले को लटकाने के बजाय बिजली अधिनियम की धारा 108 के तहत स्पष्ट निर्देश जारी करे कि प्रदेश में किसी भी निजी कंपनी को बिजली वितरण का लाइसेंस नहीं दिया जाएगा। बिजली उपभोक्ताओं का शोषण रोकने का यही एकमात्र कानूनी तरीका है।" - प्रो. संपत सिंह, वरिष्ठ नेता, इनेलो
जनहित और भविष्य की रणनीति
लेख के अंत में संपत सिंह ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने निजीकरण के प्रस्ताव को पूरी तरह से कूड़ेदान में नहीं डाला और खाली पदों पर पक्की भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं की, तो इनेलो इस आंदोलन को और तेज करेगी। उन्होंने कहा कि बिजली एक बुनियादी सुविधा है और इसका निजीकरण होने से टैरिफ में भारी बढ़ोतरी होगी, जिसका सीधा बोझ हरियाणा के किसानों, छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग पर पड़ेगा।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह आउटसोर्सिंग और कौशल रोजगार निगम के बजाय पारदर्शी तरीके से नियमित भर्ती करे ताकि युवाओं को स्थायी रोजगार मिले और बिजली निगमों की कार्यक्षमता में सुधार हो सके। संपत सिंह के इन बयानों ने हरियाणा की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है, जिसका असर आने वाले समय में विधानसभा की कार्यवाही और स्थानीय राजनीति पर दिखना तय है।





