हरियाणा की लोक संस्कृति और पारंपरिक हस्तशिल्प की अनूठी बानगी एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है। हांसी उपमंडल के अंतर्गत आने वाले ढाणा खुर्द गांव के एक कुशल शिल्पकार ने अपनी मेहनत और कला के बल पर ऐसा विशालकाय शाही पलंग तैयार किया है, जिसकी भव्यता और बनावट हर किसी को हैरान कर रही है। देशी चारपाई और पारंपरिक खाट निर्माण की कला में महारत रखने वाले कारीगर भोले भंडारी ने इस बार अपनी कला का ऐसा उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है, जो न केवल उनके गृहक्षेत्र बल्कि पूरे प्रदेश में कौतूहल और प्रशंसा का केंद्र बन गया है। लगभग चार महीने की कड़ी मेहनत के बाद बनकर तैयार हुआ यह अद्भुत पलंग अब झज्जर जिले में स्थित गुलिया खाप की ऐतिहासिक चौपाल की शोभा बढ़ाने के लिए पूरी शान के साथ रवाना हो चुका है।
इस भव्य लकड़ी और पीतल के संयोजन से बने शाही पलंग के आयाम और वजन इतने अधिक हैं कि इसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना किसी चुनौती से कम नहीं था। कारीगरी के इस नायाब नमूने को देखने और इसकी विदाई के गवाह बनने के लिए ग्रामीण भारी संख्या में एकत्र हुए। ढोल-ताशों और डीजे की धुनों के बीच उत्सव जैसा माहौल बनाते हुए इस विशालकाय ढांचे को ट्रैक्टर-ट्रॉली पर लादा गया। सुरक्षा की दृष्टि से ट्रॉली पर विशेष रूप से मजबूत लोहे के गाटर लगाए गए थे, ताकि परिवहन के दौरान इस नायाब कलाकृति को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। गुलिया खाप के प्रधान प्रदीप गुलिया स्वयं इस ऐतिहासिक पलंग को पूरे सम्मान के साथ अपनी देखरेख में झज्जर लेकर पहुंचे हैं, जहां इसे क्षेत्र की मुख्य चौपाल में स्थापित किया जाएगा ताकि ग्रामीण मेल-मिलाप और बैठकों के दौरान इसका उपयोग कर सकें।
विशालकाय आयाम और पारंपरिक कला का अनूठा संगम
इस बाहुबली पलंग की भौतिक संरचना और शिल्पकारी इसे दुनिया भर के पारंपरिक फर्नीचर से अलग खड़ा करती है। अठारह फीट लंबाई और नौ फीट चौड़ाई वाले इस भारी-भरकम ढांचे को तैयार करने में पारंपरिक तकनीकों के साथ आधुनिक मजबूती का भी पूरा ध्यान रखा गया है। इसकी बुनाई मजबूत और टिकाऊ रेशम की रस्सियों से की गई है, जो लंबे समय तक उपयोग के बाद भी अपनी कसावट बनाए रखती हैं और इन्हें आसानी से साफ भी किया जा सकता है। कारीगर की बारीकी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके पायों और सीढ़ियों पर बेहद आकर्षक व जटिल डिजाइन उकेरे गए हैं। विशेष रूप से इसके मुख्य पायों पर राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ की आकृति को उकेरा गया है, जो इस पूरे फर्नीचर को एक राजकीय और गौरवशाली स्वरूप प्रदान करती है।
| विशेषता / पैरामीटर | विवरण |
|---|---|
| निर्माता एवं कलाकार | भोले भंडारी (ढाणा खुर्द, हांसी) |
| गंतव्य स्थान | गुलिया खाप चौपाल, झज्जर |
| कुल आकार | 18 फीट लंबा और 9 फीट चौड़ा |
| निर्माण सामग्री | मजबूत लकड़ी, 60 किलो पीतल और रेशम की रस्सियां |
| कुल लागत | लगभग 4,00000 रुपये (4 लाख रुपये) |
| निर्माण अवधि | लगभग 4 महीने |
दो दशकों की साधना और भविष्य की बड़ी परियोजनाएं
इस अद्वितीय कला के रचयिता भोले भंडारी पिछले करीब पच्चीस वर्षों से पारंपरिक चारपाई और पलंग निर्माण के कार्य से जुड़े हुए हैं। शुरुआती दौर में उनके द्वारा बनाए जाने वाले सामान्य और पारंपरिक शैया उत्पाद मामूली कीमतों पर बिकते थे, लेकिन समय के साथ उनकी कला की बारीकियों ने उन्हें एक अलग मुकाम दिलाया। हरियाणा के प्रसिद्ध सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेले में मिली ख्याति के बाद उनके परिवार के इस पारंपरिक व्यवसाय को एक नई उड़ान मिली। आज स्थिति यह है कि उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले इन शाही पलंगों की मांग न केवल हरियाणा के विभिन्न जिलों में, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, नोएडा और यहां तक कि विदेशों में बैठे प्रवासी भारतीयों के बीच भी तेजी से बढ़ रही है। सामान्य ऑर्डर से शुरू हुआ यह सफर अब लाखों रुपये मूल्य के कस्टमाइज्ड शाही फर्नीचर तक पहुंच चुका है।
"हमने इस विशाल पलंग को पूरी तन्मयता से चार महीने में तैयार किया है। इसमें 60 किलो शुद्ध पीतल और मजबूत रेशम की रस्सियों का प्रयोग हुआ है। इस पर एक साथ सौ से अधिक लोग बैठ सकते हैं। अब हमें इससे भी बड़ा, यानी 22 फुट लंबा और 11 फुट चौड़ा एक और शाही पलंग बनाने का ऑर्डर मिलने की उम्मीद है, जिस पर बातचीत चल रही है।" - भोले भंडारी, शिल्पकार एवं निर्माता
ग्रामीण संस्कृति और भाईचारे का प्रतीक बनेगी चौपाल की यह शान
हरियाणा की संस्कृति में 'चौपाल' का महत्व केवल एक बैठक स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपसी भाईचारे, पंचायत के फैसलों और सामाजिक सौहार्द का केंद्र होती है। झज्जर की गुलिया खाप चौपाल में इस बाहुबली पलंग की स्थापना से न केवल इस स्थान के सौंदर्यीकरण में वृद्धि होगी, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए पारंपरिक हस्तशिल्प की जीती-जागती मिसाल भी बनेगा। आधुनिक दौर में जहां लोग पारंपरिक संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, वहीं इस तरह के विशालकाय और कलात्मक प्रयासों से ग्रामीण अंचल की पुरानी बपौती को सहेजने का सराहनीय कार्य हो रहा है। इस अनोखी विदाई और भव्य स्वागत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हरियाणा के हुनरमंद कारीगर अपनी माटी की खुशबू को दुनिया भर में किस कदर जीवंत रखे हुए हैं।





