हरियाणा के कैथल जिले के अजीत नगर निवासी पैरा तीरंदाज हरविंदर सिंह ने एशियन पैरा गेम्स में एक बार फिर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उन्होंने अपने साथी विजय सुंडी के साथ मिलकर पुरुषों के डबल्स इवेंट में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद कैथल स्थित उनके निवास पर जश्न का माहौल है, जहाँ परिवार और स्थानीय लोग हरविंदर के संघर्षपूर्ण सफर को याद कर रहे हैं।
यह जीत सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, अदम्य साहस और अथक परिश्रम की कहानी है। हरविंदर सिंह का जीवन बचपन से ही चुनौतियों से भरा रहा है, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनकी यह उपलब्धि हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी, जो शारीरिक बाधाओं के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने का हौसला रखते हैं।
एशियाई पैरा गेम्स में स्वर्ण पदक का रोमांचक मुकाबला
जापान के ओकाजाकी चुओ सोगो पार्क मल्टीपर्पस स्क्वायर में खेले गए फाइनल मुकाबले में हरविंदर सिंह और विजय सुंडी की भारतीय जोड़ी का सामना चीन के युन डुओ और झाओ लिक्स्यू की मजबूत टीम से हुआ। भारतीय जोड़ी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए चीनी प्रतिद्वंद्वियों को 5-1 के प्रभावशाली अंतर से हराया। मुकाबले का पहला सेट बेहद रोमांचक रहा, जहाँ दोनों टीमों ने 35-35 अंकों की बराबरी की। इसके बाद, भारतीय तीरंदाजों ने अगले सेटों में अपनी पकड़ मजबूत की और लगातार बढ़त बनाते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा कर लिया। यह प्रदर्शन न केवल उनकी तकनीकी दक्षता, बल्कि दबाव में भी शांत रहने की उनकी क्षमता को दर्शाता है।
हरविंदर की यह जीत भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, विशेषकर पैरा-स्पोर्ट्स के क्षेत्र में, जहाँ भारतीय एथलीट लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। इस पदक ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति को और मजबूत किया है और देश के कोने-कोने में खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए प्रेरित किया है।
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| खिलाड़ी का नाम | हरविंदर सिंह (कैथल, हरियाणा) |
| जोड़ीदार | विजय सुंडी |
| स्पर्धा | पुरुष डबल्स तीरंदाजी (पैरा) |
| आयोजन | एशियन पैरा गेम्स |
| स्थान | ओकाजाकी चुओ सोगो पार्क मल्टीपर्पस स्क्वायर, जापान |
| जीता गया पदक | स्वर्ण |
| फाइनल प्रतिद्वंद्वी | युन डुओ और झाओ लिक्स्यू (चीन) |
| फाइनल स्कोर | भारत 5 - चीन 1 |
संघर्षों से भरा जीवन और अदम्य इच्छाशक्ति
हरविंदर सिंह का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा है। मात्र डेढ़ साल की उम्र में बुखार के कारण उन्हें पोलियो हो गया था, जिससे उनकी बाईं टांग प्रभावित हुई। इस शारीरिक चुनौती के बावजूद, हरविंदर ने कभी हार नहीं मानी। पटियाला यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्हें तीरंदाजी का शौक लगा, और यहीं से उन्होंने देश के लिए पदक जीतने का सपना देखा। उनका यह सपना 2020 टोक्यो पैरालंपिक में कांस्य पदक जीतकर सच हुआ था, जो उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रमाण है।
कोरोना महामारी के दौरान जब प्रशिक्षण सुविधाएं बाधित हुईं, तब उनके पिता ने एक असाधारण कदम उठाया। उन्होंने अपने खेत को ही एक अस्थायी आर्चरी रेंज में बदल दिया, ताकि हरविंदर की ट्रेनिंग में कोई बाधा न आए। यह दिखाता है कि कैसे एक परिवार का समर्थन किसी एथलीट को ऊंचाइयों तक पहुंचने में मदद कर सकता है। हरविंदर की यह यात्रा न केवल खेल के क्षेत्र में, बल्कि जीवन के हर पहलू में चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा देती है।
"मेरा बेटा बचपन से ही मेहनती और लगनशील रहा है। जब उसे पोलियो हुआ तो लगा कि जीवन थम सा गया है, लेकिन उसने कभी हिम्मत नहीं हारी। आज उसकी यह जीत हमारे पूरे परिवार के लिए सबसे बड़ा सम्मान है। उसने देश का नाम रोशन किया है, यह देखकर मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया है।" - हरविंदर सिंह के पिता
शिक्षा और खेल का अद्भुत संतुलन
33 वर्षीय हरविंदर सिंह केवल एक उत्कृष्ट एथलीट ही नहीं हैं, बल्कि वे एक होनहार छात्र भी हैं। वे वर्तमान में अर्थशास्त्र विभाग से पीएचडी कर रहे हैं, जो उनकी बौद्धिक क्षमता और बहुमुखी प्रतिभा का परिचायक है। खेल और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में एक साथ उत्कृष्टता प्राप्त करना एक दुर्लभ उपलब्धि है, जिसे हरविंदर ने अपनी कड़ी मेहनत और समय प्रबंधन के माध्यम से संभव कर दिखाया है। उनका यह उदाहरण उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो अक्सर खेल और पढ़ाई में से किसी एक को चुनने की दुविधा में रहते हैं।
हरविंदर की अगली निगाहें पेरिस पैरालंपिक पर टिकी हैं, जहाँ वे पुरुष रिकर्व के फाइनल में स्वर्ण पदक जीतने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। उनकी पिछली उपलब्धियां और वर्तमान फॉर्म यह दर्शाती है कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम हैं। उनके समर्पण और अनुशासन ने उन्हें एक ऐसे मुकाम पर पहुंचाया है, जहाँ वे न केवल अपने लिए, बल्कि पूरे देश के लिए मिसाल कायम कर रहे हैं।
आगे की रणनीति और सरकार का समर्थन
हरविंदर सिंह की इस जीत ने हरियाणा सरकार और खेल प्राधिकरणों का ध्यान एक बार फिर पैरा-स्पोर्ट्स की ओर आकर्षित किया है। भविष्य में ऐसे एथलीटों को और अधिक समर्थन और संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि हरविंदर जैसे खिलाड़ियों की सफलता अन्य दिव्यांग व्यक्तियों को भी खेलों में भाग लेने और अपनी क्षमता को पहचानने के लिए प्रोत्साहित करेगी।
सरकार की ओर से प्रशिक्षण सुविधाओं में सुधार, अंतरराष्ट्रीय स्तर के कोचों की उपलब्धता और आर्थिक सहायता जैसे कदम इन खिलाड़ियों के प्रदर्शन को और बेहतर बनाने में सहायक होंगे। हरविंदर सिंह जैसे एथलीटों का सम्मान और प्रोत्साहन न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों को मान्यता देता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि देश में खेल संस्कृति का विकास हो और अधिक से अधिक प्रतिभाएं सामने आएं। उनकी आगामी पेरिस पैरालंपिक की तैयारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान करने पर भी विचार किया जा रहा है।





