हरियाणा के गुरुग्राम और नूंह जिलों में एक निजी कंपनी को समानांतर बिजली वितरण का लाइसेंस दिए जाने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। इस व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक हलकों से लेकर कर्मचारी संगठनों तक तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, जिसके चलते राज्य सरकार पर अपनी नीति स्पष्ट करने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रदेश के बिजली ढांचे में निजीकरण की दखलअंदाजी को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिस पर विभिन्न श्रमिक संगठनों की पैनी नजर बनी हुई है।
इसी कड़ी में इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (ईईएफआई) ने आक्रामक रुख अपनाते हुए सीधे प्रदेश के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को एक विस्तृत पत्र प्रेषित किया है। फेडरेशन की तरफ से यह मांग पुरजोर तरीके से उठाई गई है कि सरकार केवल हरियाणा विद्युत नियामक आयोग (एचईआरसी) के फैसलों के खिलाफ अदालती अपीलों तक सीमित न रहे, बल्कि विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 108 का उपयोग करते हुए इस संवेदनशील विषय पर अपना लिखित और पारदर्शी नीतिगत निर्देश सार्वजनिक करे ताकि भविष्य की दिशा स्पष्ट हो सके।
समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस और संपूर्ण घटनाक्रम
यह पूरा विवाद तब गहराया जब हरियाणा विद्युत नियामक आयोग ने इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में एक बड़ा फैसला सुनाते हुए उसे गुरुग्राम और नूंह के चुनिंदा क्षेत्रों में अगले 25 वर्षों के लिए समानांतर बिजली वितरण का अधिकार सौंप दिया। श्रमिक संगठनों के अनुसार, भौगोलिक और उपभोक्ता आधार के लिहाज से उत्तरी भारत के इस प्रमुख राज्य में इस प्रकार का यह अपनी तरह का पहला लाइसेंस है, जिसे लेकर शुरुआती दौर से ही तकनीकी जानकारों में चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं।
नियामक आयोग के इस निर्णय से पहले ही राज्यभर के बिजली निगमों के इंजीनियर, विभिन्न कर्मचारी यूनियनें और प्रमुख किसान संगठन लगातार इसके विरोध में स्वर मुखर कर रहे थे। तमाम विरोध प्रदर्शनों और आपत्तियों को दरकिनार करते हुए लाइसेंस प्रदान किए जाने के बाद से ही प्रशासनिक अमले और बिजली सेक्टर से जुड़े हितधारकों के बीच असंतोष का माहौल पनप रहा है, जो अब संगठित रूप से सरकार के समक्ष नीतिगत स्पष्टता की मांग के रूप में सामने आ रहा है।
| विवरण बिंदु | तथ्य एवं आंकड़े |
|---|---|
| प्रभावित क्षेत्र | गुरुग्राम और नूंह जिले |
| लाइसेंस प्राप्तकर्ता | इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड |
| लाيسेंस की अवधि | 25 वर्ष |
| निर्णय लेने वाली संस्था | हरियाणा विद्युत नियामक आयोग (HERC) |
| मांग करने वाला संगठन | इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (EEFI) |
कर्मचारी संघों का विरोध और कानूनी प्रावधानों की मांग
फेडरेशन के महासचिव सुदीप दत्ता द्वारा प्रेषित किए गए आधिकारिक पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि सरकार को बिजली जैसे बुनियादी और संवेदनशील क्षेत्र में नीतिगत शून्यता की स्थिति को तुरंत समाप्त करना चाहिए। उनका तर्क है कि यदि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को कमजोर करने वाले इस तरह के लाइसेंसों पर सरकार ने समय रहते अपनी स्पष्ट स्थिति जाहिर नहीं की, तो इससे पूरे राज्य के ऊर्जा वितरण तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और कर्मचारियों का मनोबल भी गिर सकता है।
संगठन का यह भी मानना है कि विद्युत अधिनियम की धारा 108 राज्य सरकारों को नीतिगत मामलों में नियामक आयोगों को दिशा-निर्देश देने का विधिक अधिकार देती है। ऐसे में, केवल कानूनी औपचारिकताओं या अपील प्रक्रिया तक सीमित रहने के बजाय राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए एक ठोस नीतिगत ढांचा तैयार किया जाना चाहिए, जो आम उपभोक्ताओं और बिजली कर्मियों दोनों के हितों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हो।
"हरियाणा विद्युत नियामक आयोग द्वारा निजी कंपनी को 25 साल का समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस देना राज्य के ऊर्जा ढांचे के लिए चिंता का विषय है। सरकार केवल अपील तक सीमित न रहे, बल्कि धारा 108 के तहत अपना नीतिगत रुख स्पष्ट करे।" - सुदीप दत्ता, महासचिव, ईईएफआई
आम जनजीवन, उपभोक्ताओं और बिजली व्यवस्था पर संभावित असर
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गहरा प्रभाव आम उपभोक्ताओं, किसानों और औद्योगिक इकाइयों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। जानकारों का कहना है कि एक ही भौगोलिक क्षेत्र में दो अलग-अलग वितरण कंपनियों के होने से टैरिफ दरों, बुनियादी ढांचे के रखरखाव और क्रॉस-सब्सिडी मॉडल पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे अंततः आम जनता की जेब पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है।
इसके अतिरिक्त, ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि बेल्ट से जुड़े किसान संगठनों में भी इस बात को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है कि निजीकरण के बढ़ने से उन्हें मिलने वाली बिजली सब्सिडी और निर्बाध आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि यह मुद्दा अब केवल विभागीय कर्मचारियों तक सीमित न रहकर आम जनहित और उपभोक्ता अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक प्रश्न बन चुका है, जिस पर सरकार की आगामी प्रतिक्रिया पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।
प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में आगामी हलचल
फेडरेशन के इस कड़े पत्र के बाद अब राज्य के ऊर्जा विभाग और प्रशासनिक गलियारों में मंथन का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में विपक्ष भी इस मुद्दे को विधानसभा से लेकर सड़क तक जोर-शोर से उठा सकता है, क्योंकि हरियाणा में बिजली दरों और वितरण व्यवस्था से जुड़े मुद्दे हमेशा से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। सरकार के नीति निर्धारकों के लिए यह संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती होगा कि वे एक तरफ निवेश और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दें और दूसरी तरफ सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों व आम जनता के व्यापक हितों को भी सुरक्षित रखें।





